आत्मनिर्भर हिंदी

आत्मनिर्भर बनने की कसम हमने खाई हैं,

गलवान में चीन को धूल हमनें चटाई है|

आज नमस्ते ने पूरी दुनिया में धूम मचाई है,

हिंदी को चरम पर पहुँचाने की तमन्ना दिल में आई है|

आत्मनिर्भर बनने की…………………………

दुनिया को हिंदी में आज वैज्ञानिकता नज़र आई है,

पर हमनें इसे राष्ट्रभाषा अभी तक नहीं बनाई हैं|

अंग्रेजी ने अनिवार्य विषय में अपनी जगह बनाई हैं,

आत्मनिर्भर बनने की…………………………

९० प्रतिशत अंक लाने वाले को हिंदी गिनती नहीं आ पाई है,

वन, टू, थ्री और a, b, c, d   हमनें ही तो इन्हें रटाई हैं|

कसूर किसका इसमें है, दुनिया समझ नहीं ये पाई हैं,

आत्मनिर्भर बनने की…………………………

स्वदेशी अपनाओं के नारे ने उम्मीद की किरण जगाई है,

अब सभी ने ख्वाबों की एक नई दुनिया बसाई हैं|

हिंदी भी सबके दिलों में बस जाएगी, छोड़ दी तनहाई हैं,

आत्मनिर्भर बनने की कसम हमने खाई हैं,

हिंदी को चरम पर पहुँचाने की तमन्ना दिल में आई है|

                                                    किरण यादव

हिंदी भाषा के बढ़ते कदम

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4 responses to “आत्मनिर्भर हिंदी”

  1. सत्य वचन, अद्भुत कविता

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  2. MADAM, I WANT TO TALK REGARDING THE USE OF THIS POEM FOR MY PERSONAL USE contact email rohitakodia@gmail.com

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    1. Hello Rohit Choudhary!
      I’m glad you liked my content and want to reuse it. I would like to know the details of where and for what purpose you want to use my poem. Republishing or mentioning content from hindikatha.com will imply credits and charges.

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      1. Okay no problem ma’am, I’ll explain everything but before that may I get your email address to discuss everything there.

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