आठवीं पास

                                               आठवीं पास

बहुत सालों पहले की बात है, एक छोटा सा गॉंव था, उस गॉंव में एक लड़की रहती थी, नाम था गीता |

गीता ने अपने माता-पिता को बचपन में ही खो दिया था, तब से वह अपने नाना-नानी के साथ ही रह रही थी | उनसे ही उसे पता चला कि उसके माता-पिता किसी बीमारी के कारण चल बसे क्योंकि गॉंव के छोटे होने की वजह से वहाँ ज्यादा कुछ सुविधाएँ नहीं थी, गॉंव में कोई अस्पताल और डॉक्टर नहीं होने के कारण उन्हें समय पर ईलाज न मिला और वो दोनों कम उम्र में ही दुनिया छोड़ कर चले गए |

 नाना-नानी गीता को हमेशा खुश रखने का प्रयास करते और चाहते थे कि उसे कोई भी तकलीफ न हो| नानाजी की गॉंव में एक किराणा की दुकान थी | वो एक एक पैसा जमा करते ताकि गीता को दूसरो का मुहँ न ताकना पड़े , उन्होंने उसे पढ़ने के लिए स्कूल भी भेजा |

                 आज गीता के आठवीं कक्षा की परीक्षा का परिणाम आने वाला था, गीता सुबह से ही बहुत खुशा थी | वह स्कूल गई अपना  परीक्षा परिणाम लिया और नानजी की दुकान पर लौट आई|

वह दुकान के एक कौने में गुमसुम सी बैठ गई | दुकान पर काफ़ी ग्राहक आ रहे थे और व्यस्तता के कारण नानाजी का ध्यान उस पर नहीं गया बल्कि अनायास ही वो उससे कुछ छोटे-छोटे  काम करवाते रहे जैसे गीता माचीस देना, बच्चें को पाँच रुपए का बिस्कुट का पैकेट देना, पैसे गल्ले में रख दे, पास की दुकान से सामान ला दे आदि | 

                             

गीता सारा काम बिना कुछ बोले चुपचाप किए जा रही थी | जब दुकान में ग्राहक कम हुए तब नानाजी को एहसास हुआ कि हमेशा चिड़िया की तरह चहकने वाली गीता आज इतनी गुमसुम क्यों है? क्या बात हो गई | तभी उन्हें अचानक याद आया कि आज तो परीक्षा का परिणाम आने वाला था फिर उन्होंने उससे पूछा , अरे! आज तो हमारी बिटिया रानी का परिणाम आने वाला था , पहले नंबर पर आई है  मेरी बेटी है न |

और मैं हूँ कि काम में इतना व्यस्त, कि रानी बेटी से कुछ पूछा ही नहीं इसलिए तुम नाराज हो गई हैं न|

मुझे माफ़ कर दो बेटी लोगों के आने जाने के कारण मुझे ये ख्याल ही नहीं आया | चलो! अब बताओ तुम क्या खाओगी ? आज नानी को बोलते ही वो तुम्हारे किए  कुछ खास जायकेदार, लजीज खाना बनाए और मैं हलवाई के वहाँ से मिठाई भी ले आता हूँ|

इन सभी बातों के बावजूद गीता शांत थी एक शब्द भी नहीं बोली| नानजी को लगा खाना खाने और उपहार पाने के बाद शायद वह मान जाएगी|

नाना-नानी ने गीता के सभी दोस्तों को भी दावत में बुलाया सबने खूब मस्ती की पर गीता के चहरे पर वो ख़ुशी नहीं दिखी जो हमेशा होती थी | अब नाना-नानी का मन कुछ बैचेन होने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा , वो दुसरे दिन गीता के स्कूल जाते है और अध्यापक जी से पूछते है कि इस बार गीता का परीक्षा परिणाम कुछ अच्छा नही रहा क्या? पर उनसे पता चला कि इस बार तो गीता पूरे स्कूल में प्रथम आई है| मैं आपको बधाई देने आने ही वाला था|

फिर क्या बात हो सकती है ? नानाजी ने अपने आप से पूछा | अध्यापक जी ने उनसे पूछा जरा विस्तार से बताइए, कि क्या हुआ है? सारी बात जानने के बाद अध्यापक जी नानाजी के साथ उनके घर जाते है| वे गीता से जानने की कोशिश करते है कि आखिर उसकी उदासी का कारण क्या है , बहुत पूछने के बाद पता चलता है कि गीता पूरे विद्यालय में प्रथम तो आई है परंतु अब वो आगे की पढाई जारी नहीं रख पाएगी | क्योंकि गॉंव के विद्यालय में आगे कोई कक्षा है ही नहीं और गीता डॉक्टर बनना चाहती है, जिससे वो उन बीमार और  जरुरतमंद लोगों का ईलाज कर सके, ताकि अपने माता-पिता की तरह अन्य लोग अपनी जान न गवाएँ| गीता ये जानती थी कि आगे पढ़ने के लिए उसे शहर जान पड़ेगा और शहर जाने के लिए  नदी पार करनी पड़ेगी जो उसके लिए बहुत कठिन कार्य था और ये ही उसकी उदासी की वहज भी थी|

 नाना-नानी और अध्यापक जी को आज गीता पर बहुत गर्व हो रहा था कि गीता आज सिर्फ़ आठवीं पास हुई है और उसकी सोच कितनी बड़ी है, वो  केवल अपने बारे में न सोच कर सभी के बारे में सोच  रही है ताकि सभी को उसक फायदा मिल सके …….

परंतु आगे की राह सिर्फ़ उनके लिए ही नहीं गीता के लिए भी आसान नहीं थी | ये बात गीता भी जानती थी इसलिए वो गुमसुम सी रहने लगी| उसके नाना-नानी उसे इस प्रकार उदास नहीं देख सकते थे इसलिए शहर के एक विद्यालय में उसका दाखिला करवा देते है और गीता पूरे जोश और उत्साह से स्कूल जाने लगती है|

कुछ दिनों बाद बारिश का मौसम शुरू हो जाता है नदियाँ पूरे उफान से बह रही है| उसे स्कूल जाने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था | उन्ही दिनों में एक दिन जब गीता स्कूल जा रही थी, तभी उसने देखा कि एक महिला नदी पार करते वक्त फिसल कर नदी में गिर गई और वह बचाओं-बचाओं  चिल्लाने लगी आस-पास कुछ लोग थे पर डर के मारे वो उसे बचाने नहीं गए , गीता बिना कुछ सोचे और इंतजार किए नदी में कूद पड़ी और बड़ी मशक्त के बाद आखिर उस महिला को बच लिया| महिला और कोई नहीं वो एक सरकारी अफसर थी जो गॉंव का सर्वेक्षण करने के लिए आई थी और उसके साथ जो लोग थे वो मदद बुलाने के लिए फोन ही करते रहे और मदद आती तब तक गीता ने उन्हें बचा लिया |

गीता की बहादुरी के चर्चे आस-पास के गॉंव में भी होने लगे | उसकी बहादुरी और दिलेरी के लिए उसे १५ अगस्त पर पुरस्कार से नवाजा गया | जिससे गीता के हौसले और बुलंद हो गए और वो बिना घबराए रोज नदी पार  करके स्कूल जाने लगी और कड़ी मेहनत करके पढाई करती और हर परीक्षा में वो अव्वल आती|

आज वो आठवीं  पास लड़की एक सफल डॉक्टर बन गई और अपने ही गॉंव में लोगों का मुफ्त में ईलाज करती है| उसकी मेहनत और लगन से  न सिर्फ़ उसको सफलता हासिल हुई बल्कि गॉंव के लोगो को भी मदद मिली |

                                                                                                        -किरण यादव

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4 responses to “आठवीं पास”

  1. so interesting and thoughtful story

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  2. बहुत खूब किरन। यह कहानी पढ कर मुझे बचपन में पढी नंदन की कहानियों याद आ गई। ऐसे ही लिखती रहो। मेरी शुभकामनाये ह

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    1. धन्यवाद मीनाक्षी जी

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  3. किरन जी आपने बेहतरीन कहानी लिखी है

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