गणेश जी और धोबिन की कथा

                                 गणेश जी और धोबिन

     एक गाँव में एक धोबिन रहती थी| एक दिन वह कपडे धोने के लिए धोबीघाट गई थी, उस दिन उसे घर लौटने में बहुत देर हो गई| जैसे ही वह घर लौटी घर में बंधी हुई बकरियाँ मिमियाने लगी|

इधर उस धोबिन का भी भूख से हाल बेहाल था, ऐसी परिस्थिति में यदि वो अपने लिए खाना बनाती है तो, बकरियां भूखी मरती है, अब क्या करें? उस धोबिन ने सोचा कि यदि वो बकरियों को नहीं ले जाएगी , तो धूप भी तेज हो जाएगी और ऐसे में बेचारी बकरियाँ कैसे चरेगी?

तभी उसने एक युक्ति सोची और थोडा-सा आटा लेकर वो बकरियों को चराने लेकर चली गई| बकरियों को चरने के लिए छोड़ दिया और खुद भी अपने खाने का बन्दोबस्त करने में जुट गई| आटा गूँथकर उसने मोटी-मोटी दो रोटियाँ बना ली|

रोटी तो बन गई पर समस्या यह थी कि अब ये रोटियाँ खाये किससे? तभी उसे तालाब के किनारे एक मंदिर दिखा, वह उस मंदिर में गई और वहाँ गणेश की मूर्ती के सामने जलते दिए में से घी लिया और मस्त चूर-चूर कर रोटियाँ खा ली| यह सब देखकर गणेश जी ने अपने दाँतों तले उँगली लगा दी| गणेश जी सोचने लगे कि लोग तो मेरे दिए में घी डालते है और ये औरत मेरा ही घी खा रही वो भी मेरे नज़रों के सामने!

दूसरे दिन जब पुजारी मंदिर आया तो क्या देखता है? अरे! ये क्या? गणेश जी ने दाँतों तले उँगली लगा रखी है| वह तुरंत भागा-भागा राजा के पास गया और हाँफते हुए उन्हें बताया कि हमारे राज्य पर बहुत बड़ी मुसीबत आने वाली है, क्योंकि गणेश जी ने दाँतों तले उँगली लगाई है, शायद वो हमसे नाराज है|

उसी समय राजा ने पुजारी को मंदिर में पूजा पाठ करने का आदेश दिया और कहा कि कैसे भी करके गणेश जी को प्रसन्न करो| मंदिर में बहुत पूजा, पाठ, हवन इत्यादि किए गए पर गणेश जी की उँगली टस से मस नहीं हुई| राजा ने बड़े-बड़े महान ज्ञानी पंडितो को बुलाया, दान-धर्म किए| सब गाँव वालों ने व्रत-उपवास किए पर, फिर भी गणेश जी ने अपनी उँगली नहीं हटाई| सभी परेशान हो रहे थे कि ऐसी क्या गलती हो गई जो गणेश जी इतने नाराज है| सभी को चिंता सता रही थी कि कुछ अनहोनी ना हो जाये| अब राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो कोई भी व्यक्ति गणेश जी की उँगली यथा स्थान लाएगा, राजा उन्हें पूरे पाँच गाँव दान में देगा|

यह मुनादी धोबिन ने भी सुनी, वह अपनी सासु माँ से बोली कि मैं ये काम तो यूँ चुटकियों में कर सकती हूँ| सासु माँ ने सुनकर उसको कहा कि पागल हो गई है, बड़े-बड़े महान ज्ञानी पंडित ये काम न कर पाए और तुम बोल रही हो कि तुम यह काम चुटकियों में कर लोगी चुपचाप बैठ जा कहीं जाने की जरुरत नहीं है|

फिर भी धोबिन राजा के दरबार में चली गई और उनसे विनती की, कि वह ये काम कर सकती है, उसकी बाते सुनकर सभी दरबारी हँसने लगे| तब राजा ने कहा कि जब इतने लोगों ने प्रयास किया है तो इसे भी एक कोशिश करने देते है, क्या पता गणेश जी इससे मान जाए| धोबिन को इजाजत मिल गई, पर धोबिन ने अपनी कुछ शर्तें भी रखी कि मेरे घर से लेकर मंदिर तक पूरा रास्ता ढकवा दिया जाए और जब मैं वहाँ जाऊ तो कोई मुझे देखे नहीं| धोबिन की शर्तें मंजूर कर ली गई| उसके घर से मंदिर तक का पूरा रास्ता ढकवा दिया| दूसरे दिन पौ फटते ही धोबिन अपने कपड़े धोने का धोवना ओढ़नी के नीचे छुपाकर मंदिर ले गई|

गणेश जी के सामने खड़ी होकर बोलने लगी कि क्यों गणेश जी! एक बात बताओ आप रोज मोदक, लड्डू आदि प्रसाद खाते हैं, मैंने आपसे कुछ कहा? नहीं ना, आपके सामने लोग रोज हवन इत्यादि में इतना कुछ स्वाहा कर देतें हैं, तब भी मुझे कभी बुरा नहीं लगा| लगा हो तो बताओं? और एक दिन, बस सिर्फ़ एक दिन आपका घी क्या खा लिया आपको इतना बुरा लग गया कि आपने अपने दाँतों तले उँगली लगा दी? हटाते हो उँगली वहाँ से या धोवने से एक लगाऊँ?

यह सुनते ही गणेश जी को हँसी आ गई और उन्होंने अपनी उँगली हटा कर यथा स्थान रखा दी|

 धोबिन राजा के पास गई और बोली कि अब आप लोग दर्शन कर सकते हैं और हमारे राज्य पर भी अब कोई खतरा नहीं है| राजा और राज्य की प्रजा सभी मंदिर गए और भगवान के दर्शन किए सभी लोग धोबिन की जय-जयकार करने लगे| राजा ने अपने कहे मुताबिक धोबिन को पाँच गॉंव दान में दे दिए|

धोबिन को अपने अच्छे कर्मों का फ़ल मिल गया, क्योंकि उसने बकरियों के खातिर स्वयं के लिए खाना नहीं बनाया और पहले वो उन्हें चराने के लिए ले गई| गणेश जी ने ईनाम स्वरूप धोबिन को पाँच गाँव दिलवाए, ऐसे ही भगवान किसी न किसी तरीके से हमें अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल अवश्य देते हैं| अत: निरंतर सुकर्म करते रहना चाहिए|

धन्यवाद

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