कविता-यादें

         यादें

गुलाबी सी सुबह है,

घर से निकलने की क्या खूब वजह है |

हवाओं में हल्की सी महक है,

पक्षियों के बोलने की चहक है|

कुछ ही दूर चले थे हम,

भूल गए थे सारे गम|

हिला दिया इन ठंडी हवा के थपेड़ों ने,

याद कुछ दिलाया चैरी के इन पेड़ों ने|

हाथों  में लिए हाथ कदम से कदम मिलाते,

साथ-साथ प्यार के दीप जलाते|

चलते थे बातें यूँ करते,

प्रेम के गीत गुनगुनाते|

यादों में डूब गया था ये दिल,

एक बार फिर उनसे मिल|

प्यार का राग छेड़ा, महकी सी हवा ने छूकर,

जीवन में नए तराने बाँधे एक बार फिर आकर|

गुलाबी सी सुबह है,

घर से निकलने की क्या खूब वजह है |

                          -किरण यादव

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