दोस्ती की दास्तान

दो अलग-अलग धर्मों के दोस्तों की एक ऐसी अनोखी कहानी जिसमें वो एक दूसरे के लिए जान दे दें|

Two friends

चिराग और नमन की दोस्ती पूरे गॉंव में प्रसिद्ध थी| गॉंव में जब भी कभी किसी दोस्ती, दोस्त या ऐसी कुछ बात होती तो चिराग और नमन की दोस्ती को अवश्य याद किया जाता | दोनों बचपन से ही बहुत घनिष्ठ मित्र थे, दोनों हमउम्र होने के साथ-साथ एक ही कक्षा में पढ़ते थे | घर आने के बाद भी दोनों साथ मिलकर अपना गृहकार्य करते थे| या तो नमन चिराग के घर जाता या फिर चिराग नमन के घर पर पढाई करता| दोनों के घर भी पास-पास में ही थे इसलिए दोनों के माता-पिता की भी कुछ परेशानी नहीं होती |

               उम्र बढ़ने के साथ-साथ दोनों की दोस्ती और भी गहरी होती चली गई जब कोई एक कुछ गलत राह पर जाता तो दूसरा उसे जाने से रोकता| हर मुसीबत का दोनों डँटकर सामना करते, सारे तीज त्योहार भी दोनों हँसी-ख़ुशी मनाते | ऐसा लगता था कि वो कभी भी अलग नहीं होगें |

परंतु नियति को कुछ ओर ही मंजूर था| कुछ सालों बाद दोनों को बहुत अच्छी नौकरी मिल गई परंतु अलग-अलग शहर में | दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे पर नौकरी, जो है वो कड़ी मेहनत के बाद मिली थी इसलिए उसे छोड़ना उचित नहीं था| घरवालों के दबाव और अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए दोनों ने भिन्न-भिन्न शहरों में जाने का फैसला ले लिया |  चिराग और नमन पहली बार एक-दूजे से अलग हुए थे, इसलिए दोनों ने एक दूसरे की तस्वीर अपने पास रखने का निश्चय किया|

एक दिन चिराग अपने ऑफिस में काम कर रहा था तभी उसका नौकर उसके कमरे में आया और काम करते-करते गलती से नमन की तस्वीर गिर के टूट गई| बस इतनी-सी बात से चिराग आग बबूला हो गया और अपने क्रोध पर काबू न रहने के कारण वह नौकर को बुरी तरह डाँटने लगा , लेकिन उसका नौकर चुपचाप खड़ा-खड़ा मन ही मन कुछ सोच रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे यह सब देखकर उसे कुछ आश्चर्य हो रहा हो और शायद उसे कुछ पुरानी बातें याद आ रही हो| उस समय तो वह अपना सिर झुकाकर वहाँ से चला गया और एक दिन चिराग का अच्छा मूड देखकर आखिर पूछ ही लिया कि मुझे माफ़ कीजियेगा, छोटे मुहँ बड़ी बात पर उस दिन मुझसे अनजाने में एक तस्वीर टूट गई थी, शायद वो तस्वीर आपके किसी प्रिय की थी……

मुझे भी माफ़ करना उस दिन मैंने तुम पर बहुत गुस्सा किया पर बात ही कुछ ऐसी थी वो तस्वीर मेरे सबसे करीबी दोस्त की थी जो मेरे दिल में बसता है और मैं कभी भी उसके साथ कुछ बुरा होते नहीं देख सकता और तुमने उसकी ही तस्वीर तोड़ दी| पर उस दिन मुझे कुछ अजीब लगा, मैंने देखा कि मेरे डाँटने  के बावजूद तुम किसी दूसरे ही ख्यालो में खोये हुए थे|  

हाँ! साहब  मैं सोच रहा था कि ऐसे दोस्त बहुत कम होते जो दोस्त की एक तस्वीर का भी इतना ख्याल रखता है और तभी मुझे भी अपने गॉंव के दो दोस्तों की याद आ गई | (कहते-कहते आवाज़ भर्राने लगती है|) 

क्या बात है? मुझे बताओं,

तब वह चिराग को सारी बात बताता है|

आप दोनों दोस्तों की तरह हमारे गॉंव में भी दो दोस्त थे असलम और श्रवण| असलम और श्रवण साथ-साथ पढ़ते, खेलते और यहाँ तक की एक दूसरे के लिए जान देने को भी तैयार रहते|

दो साल पहले  ईद के दिन असलम मस्जिद में नमाज पढ़कर सीधा श्रवण के घर आया और उसे अपने साथ लेकर गया उस दिन असलम के घर उसकी दीदी के ससुराल से कुछ मेहमान आये हुए थे ईदी लेकर| वो दोनों सभी पूरे दिन मेहमानों की आवभगत में व्यस्त रहे अच्छे से उनकी खातिरदारी की क्योंकि वो लड़की वाले जो ठहरे और उस दिन दोहरी ख़ुशी का मौका था, एक तो ईद और ईद के अवसर पर दीदी के लिए उनके ससुराल वाले ईदी भी लाए थे|

दोनों दोस्त दीदी के ससुराल से कुछ लडके आये थे उन्हें  घुमाने के लिए निकल गए | बारिश के दिन थे नदी बहुत उफ़ान पर थी, वो सब लोग नदी पर घूमने चले गए| जवान खून और ख़ुशी के मौके में किसी ने कुछ सोचा भी नहीं और नदी में कूद पड़े नहाने के लिए लेकिन असलम जैसे ही नदी में कूदा वह नदी के बहाव के साथ बहने लगा श्रवण उसे बचाने के लिए गया पर पानी के झटके से वह आगे बह गया उसने बहुत कोशिश की परअसलम नहीं मिला| तब तक दूसरे दोस्तों ने घर वालों को फोन करके बुला लिया| कुछ ही देर में नदी पर पुलिस और गोताखोर का दस्ता पहुँच गया| उस दिन नदी पर देखने के लिए गॉंव वालों का हुजूम उमड़ पड़ा| शाम तक नदी के चप्पे-चप्पे को छान मारा पर असलम का कुछ पता नहीं चला| अँधेरा बढ़ने लगा धीरे-धीरे सभी निराश होकर घर चले गए सोचा कि सुबह रोशनी में फिर से तलाश शुरू करेंगे| सुबह सब लोग वापस आये फिर से नदी में ढूँढने लगे, तभी अचानक श्रवण को कुछ एहसास हुआ और वह नदी के आस-पास झाड़ियों में देखने लगा| कुछ देर के बाद जहाँ से उन लोगों ने नदी में छलाँग लगाई थी, वहीं पास की झाड़ियों में असलम की लाश पड़ी मिली| सारे गॉंव में मातम छा गया | श्रवण को इतना सदमा लगा कि कुछ हफ़्तों तक वह बोला तक नहीं और आख़िरकार उसने भी अपने प्राण त्याग दिए | ऐसा लगता था कि वो दो जिस्दोम एक जान थे| अलग-अलग धर्मों के लोगों की ऐसी दोस्ती शायद ही कहीं देखने को मिले | उसके बाद ऐसी दोस्ती दुबारा उस दिन देखी जब आप एक तस्वीर के लिए ऐसे बैचेन हो उठे |

भगवान! आपकी दोस्ती को सलामत रखें|    

चिराग फिर से अपने बचपन की मिठीं यादों में खो गया|  

                                                                                                         -किरण यादव


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4 responses to “दोस्ती की दास्तान”

  1. Smita Kshirsagar Avatar
    Smita Kshirsagar

    Beautiful story. Simple and sweet language. Crisp narrative. Keep writing

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    1. Thank you so much ma’am

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  2. Bahut achi kahani

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