सिंगल मदर

एक बेटी कैसे अपने गुस्से पर काबू पाकर अपनी माँ को अपना दोस्त बना लेती है?

मैं बहुत छोटी थी तब ही मेरे पापा और मम्मी अलग-अलग हो गए थे| मुझे कुछ याद नहीं है कि उस समय क्या हुआ था, क्यों वो दोनों अलग हो गए| कभी-कभी धुँधली सी कुछ यादें जहन में आती है, जब मैं अपने पापा के साथ आइसक्रीम खाने जाया करती थी| ज्यादा जोर देने के बाद भी मैं उन यादों को स्पष्ट रूप से अपने दिमाग में नहीं ला पाती हूँ|

लेकिन जो कुछ याद है वह कभी-कभी मुझे अंदर तक झकझोर के रख देता है| पापा से अलग हो जाने के बाद मेरी पूरी ज़िम्मेदारी मेरी मम्मी के कंधो पर आ गई थी| मेरी मम्मी एक छोटी और मामूली सी नौकरी करती थी| वह नौकरी भी शायद मेरी वजह से करनी पड़ती थी| यदि वो ये ना करती तो मेरी हर खाव्यिशें कैसे पूरी होती?

मम्मी दिन रात काम में व्यस्त रहती सुबह जल्दी उठकर खाना पकाती, मुझे स्कूल छोड़ने जाती और फिर ऑफिस जाती वैसे कहने को तो ऑफिस का टाइम ९ से ६ था पर काम ख़त्म करते-करते और घर पहुँचते-पहुँचते उन्हें कई बार रात के १० भी बज जाते थे| मेरी मम्मी ने अपनी एक सहेली को बोल रखा था कि वो मुझे रोज स्कूल बस से लेकर अपने घर छोड़ दे| आंटी मुझे छोड़ तो देती थी, पर वहीं से शुरू होता था मेरा अकेलापन|

मेरी मम्मी मेरे लिए शाम का नाश्ता बनाकर रखकर जाती थी, साथ में मुझे मिलता था एक पेपर जिस पर मेरे लिए रोज के ना-ना प्रकार के दिशा-निर्देश लिखे होते थे कि मुझे घर आकर हाथ पैर धोना, खाना खा लेना जो उस प्लेट के नीचे रखा है, गैस मत चलाना, टीवी कम देखना, होमवर्क पूरा कर लेना इत्यादि-इत्यादि| मैं भी अच्छे बच्चों की तरह उनकी हर बात मान लेती थी| जैसे ही शाम होती थी सभी बच्चें अपनी-अपनी मम्मी के साथ गार्डन में खेलने आते थे और मैं अपने घर की खिड़की से उन बच्चों को खेलते हुए देखती रहती थी| मेरा भी बहुत मन होता था कि मैं भी खेलने जाऊँ पर जा नहीं पाती थी| खेलने की आस और मम्मी के इंतजार में न जाने कितनी शामें बीत गई| कई बार तो मम्मी का और खाने इंतजार करते-करते आँख भी लग जाती थी| इन सभी वजह से मैं अपनी माँ पर गुस्सा करने लग गई| मेरी मम्मी जब मुझे समझाती तो शुरू-शुरू में तो मैं समझ भी जाती थी पर धीरे-धीरे परिस्थियाँ ऐसी बनती गई कि गुस्सा मुझपर हावी होता चला गया और मेरे उस अनाचाहें गुस्से का शिकार होती थी मेरी माँ……..

मेरी माँ मेरे हर गुस्से को सहन करती और वो जितना उनसे हो सकता उतना जल्दी आने की कोशिश करती थी मेरे लिए समय निकालने का प्रयत्न भी करती| परंतु हर दिन ऐसा हो न पता कभी-कभी कोई न कोई काम आ ही जाता था ऑफिस का नहीं भी हो तो घर के लिए सामान लाना है या बैंक का कुछ काम या फिर किसी रिश्तेदार के वहाँ किसी काम से जाना आदि|

मैं ये सारी बातें समझ नहीं पाती थी और क्रोध के मारे आग बबूला हो जाती थी, उम्र के साथ-साथ मेरा गुस्सा भी बढ़ने लगा| जब गुस्सा बेकाबू हो जाता था तब मैं चीज़ो को फेंकने लगती उन्हें तोड़ने लगती| इसकी वजह से मैंने ३ मोबाइल, टीवी के ६ रिमोट, प्लेट, दूध के कप, पानी के गिलास, पानी का मटका आदि| बर्तन पेन और पेंसिल का तो कोई हिसाब ही नहीं, यहाँ तक एक बार तो मैंने बाथरूम का दरवाजा तक तोड़ दिया| तब भी मेरी माँ मेरे शांत होने का इंतजार करती और जब मेरा गुस्सा शांत हो जाता तब वो मुझे समझाती अपनी मज़बूरी बताती पर शायद उस समय मैं कुछ समझना ही नहीं चाहती थी| वो मुझसे जितना प्यार से बात करने कि कोशिश करती मैं उतनी ही गुस्से से पेश आती थी| मुझे लगता था कि माँ कुछ समझती ही नहीं |

मम्मी को मुझे समझाना तो था ही, इसलिए उन्होंने किसी अलग तरीके से मुझे समझाने का निश्चय कर लिया| मम्मी ने मुझसे बात करना बंद कर दिया| पहले जब भी मैं कुछ चीज़े तोड़ देती थी, मम्मी वो चीज़े मुझे नई खरीद कर दे देती थी चाहे कितनी ही महँगी क्यों न हो| मेरी हर इच्छा का पूरा ख्याल रखती थी| मेरी पसंद का खाना बनाती थी, मेरे पसंद के कपड़े खरीदती थी पर अब…….. अब उन्होंने ये सब करना बंद कर दिया| यदि घर आकर मैंने खाना नही खाया हो तो भी वो मुझसे पूछती तक नहीं| अपनी पसंद का खाना पकाती सिर्फ़ अपने लिए ही कपड़ें, जूते आदि खरीदती, अब मम्मी ने मेरी परवाह करना छोड़ दिया था|

अब अहिस्ता-आहिस्ता मुझे अपनी मम्मी की कीमत का पता चलने लगा| मेर सर पर गुस्से का जो भूत सवार था, धीरे-धीरे उतरने लगा| आज मैंने भी निश्चय कर लिया चाहे कुछ भी हो जाए पहले वाली मम्मी को तो वापस लाकर ही रहूँगी |

और आज से शुरू हो गया ‘मम्मी मनाओ अभियान’| आज से मैं भी मम्मी के साथ उठने लग गयी| सबसे पहले मम्मी को घर के मंदिर के वहाँ ले गई और भगवान के सामने मम्मी से माफ़ी माँगी| और फिर उनके हर काम में मदद करने का वादा किया| वादे के मुताबिक उनके हर काम में मदद करती उनके साथ सामान खरीदने बाजार भी जाती| उनके वापस लौटने तक अपना सारा होमवर्क और पढाई पूरी कर लेती थी ताकि जब वो आए तब उनके साथ टाइम बीताने को मिले| अब खाना भी दोनों मिलकर बनाने लगे जिससे हम दोनों आपस में ढेर सारी बातें करती| धीरे-धीरे हम दोनों माँ बेटी न रहकर एक दूजे की मित्र बन गई थी, अब मैं अपनी माँ को समझने लगी थी, मैंने ये भी जाना कि माँ जानबूझकर देर नहीं करती थी, अब मैं ये जान गई थी कि यदि वो काम पूरा नहीं करती तो उनकी नौकरी पर भी असर पड़ सकता था, और अगर नौकरी से निकाला तो………….?  

अब मम्मी के पास मेरे लिए समय बचने लगा| और यदि वो समय न भी निकाल पाए तो मैं समझ जाती थी कि मम्मी की कुछ मजबूरी होगी और हम एक-दूसरे के साथ इतना समय बिताने लगे थे कि मुझे एक्स्ट्रा टाइम की जरुरत ही नहीं होती थी|

एक दिन मैंने अपनी मम्मी से पूछा कि जब मैं इतना गुस्सा करती थी तब आपने मुझे एक भी बार मारा भी नहीं, क्यों? तब उनका जवाब सुनकर मेरी आँखों से पानी आ गया, उनका जवाब था कि मैं एक सिंगल मदर हूँ, मेरा काम पर जाना बहुत ज़रूरी था, मेरे लिए पैसे कमाना जितना आवश्यक था उतना ही आवश्यक था तुम्हारे लिए समय निकलना, पर लाख कोशिशों के बावजूद मैं ऐसा नहीं कर पाई| मैं तुम्हे समझाती पर उस समय तुम इतनी छोटी थी इसलिए शायद तुम ये सब समझ नहीं पाई| इसमे तुम्हारा कोई कुसूर नहीं था, अगर तुम्हारे जगह कोई और होता तो शायद उसे भी इतना ही गुस्सा आता और वो गुस्से में ना जाने क्या करता? इसलिए मैंने तुम्हे नहीं मारा|

उस दिन मुझे समझ आगया कि सिंगल मदर होना कितना मुश्किल होता है| उसे ही पैसे कमाने, साथ में घर भी संभालना, बच्चों की ख़ुशियों का ध्यान रखते हुए उनके लिए समय भी निकलना, दुनिया के ताने सुनकर दुखों के घूँट पीना, सबके गुस्से के शिकार होना, परिवार के किसी सदस्य का साथ न मिलना और सारी मुसीबतों को हँसते हुए झेलना| ये सब उन्होंने मेरे लिए किया, मुझे बड़ा करने के लिए किया, मुझे दुनिया की हर ख़ुशी देने के लिए किया| आज मैंने जाना कि माँ अपने बच्चे के लिए दुनिया की सारी मुसीबतों को हँसते हुए सह लेती है|

-किरण यादव   

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2 responses to “सिंगल मदर”

  1. bahut khoob

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  2. kya baat hai

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